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Guptkal Ki Virasat : Vishnudhwaj-Dr. R.S. Raghav

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Guptkal Ki Virasat : Vishnudhwaj-Dr. R.S. Raghav

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About the Products:

स्वाधीनता प्राप्ति के बाद से हमारे देश का पुरातत्त्व विभाग विष्णुध्वज की भित्ति पर तीन फीट ऊँचे अरबी वाक्यों को देखकर भौंचक है। कारण, इतने विशाल अक्षरों के सामने अन्य कौन से प्रमाण देखे जाएँ। यही सबसे बड़ा प्रमाण मानकर वह उल्टी गंगा बहाने का राष्ट्रीय दायित्व पूर्ण करता आ रहा है। शेष सब प्रमाण उसके लिए गोबर-मिट्टी के समान हैं। पुरातत्त्व विभाग को विष्णुध्वज के अन्य दुर्लभ चिह्न नहीं दिखाई देते। भारत के पावन मंदिरों में प्रयुक्त होने वाले भाँति-भाँति के मंगल पुष्प, बंदनवार, घंटे, घंटियाँ, कमल, दीपक, कलश, पान, स्तूप आदि उसके लिए छोटे और बहुत ऊँचाई पर बने, आँखों से न दिखाई देने वाले चिह्न हैं। जबकि ये सब चिह्न विष्णुध्वज की परिधि पर बंदनवार के रूप में बने हैं। बंदनवार केवल भारतीय संस्कृति के भवनों, मंदिरों, तीर्थों में ही मिलता है। खंडित किए गए पूरे परिसर में देवी, देवताओं, दिगंबर साधुओं, रति-कामदेवों जैसे मनमोहक चित्र भी हैं। ऐसी कला मुसलिम भवनों, स्मारकों में कहीं नहीं मिलती। यह सोचने की बात है कि पुरातत्त्व विभाग को किसने भटकाया? अनेक ऐसे चित्र तो मात्र 10 से लेकर 20-30 फीट ऊपर तक भी घंटे घंटियों और कमल के बंदनवारों के रूप में हैं। यदि सैकड़ों फीट ऊपर के चित्र छोड़ भी दें तो ये क्यों नहीं दिखाई दिए ? आखिर पुरातत्त्व विभाग ने अपना राष्ट्रीय दायित्व निभाने में कोताही क्यों बरती ? आज देश और इतिहास के साथ किए गए इस योजनाबद्ध छल का उत्तर देना होगा।

Language: Hindi

Page No: 312

Legal Disclaimer: Product images are for illustrative purposes only. Images/packaging/ labels may vary from time to time due to changes made by the manufacturer's manufacturing batch and location.

$25.68
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Guptkal Ki Virasat : Vishnudhwaj-Dr. R.S. Raghav

About the Products:

स्वाधीनता प्राप्ति के बाद से हमारे देश का पुरातत्त्व विभाग विष्णुध्वज की भित्ति पर तीन फीट ऊँचे अरबी वाक्यों को देखकर भौंचक है। कारण, इतने विशाल अक्षरों के सामने अन्य कौन से प्रमाण देखे जाएँ। यही सबसे बड़ा प्रमाण मानकर वह उल्टी गंगा बहाने का राष्ट्रीय दायित्व पूर्ण करता आ रहा है। शेष सब प्रमाण उसके लिए गोबर-मिट्टी के समान हैं। पुरातत्त्व विभाग को विष्णुध्वज के अन्य दुर्लभ चिह्न नहीं दिखाई देते। भारत के पावन मंदिरों में प्रयुक्त होने वाले भाँति-भाँति के मंगल पुष्प, बंदनवार, घंटे, घंटियाँ, कमल, दीपक, कलश, पान, स्तूप आदि उसके लिए छोटे और बहुत ऊँचाई पर बने, आँखों से न दिखाई देने वाले चिह्न हैं। जबकि ये सब चिह्न विष्णुध्वज की परिधि पर बंदनवार के रूप में बने हैं। बंदनवार केवल भारतीय संस्कृति के भवनों, मंदिरों, तीर्थों में ही मिलता है। खंडित किए गए पूरे परिसर में देवी, देवताओं, दिगंबर साधुओं, रति-कामदेवों जैसे मनमोहक चित्र भी हैं। ऐसी कला मुसलिम भवनों, स्मारकों में कहीं नहीं मिलती। यह सोचने की बात है कि पुरातत्त्व विभाग को किसने भटकाया? अनेक ऐसे चित्र तो मात्र 10 से लेकर 20-30 फीट ऊपर तक भी घंटे घंटियों और कमल के बंदनवारों के रूप में हैं। यदि सैकड़ों फीट ऊपर के चित्र छोड़ भी दें तो ये क्यों नहीं दिखाई दिए ? आखिर पुरातत्त्व विभाग ने अपना राष्ट्रीय दायित्व निभाने में कोताही क्यों बरती ? आज देश और इतिहास के साथ किए गए इस योजनाबद्ध छल का उत्तर देना होगा।

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