
Janjateeya Yoddha : (Swabhiman Aur Swadheenta Ka Sangharsh) Tribal Warriors Of India-Ranjana Chitale
Janjateeya Yoddha : (Swabhiman Aur Swadheenta Ka Sangharsh) Tribal Warriors Of India-Ranjana Chitale
About the Products:
संस्कृति स्वाभिमान, परंपरा और स्वायत्तता की रक्षा के लिए जितना बलिदान, जितना संघर्ष भारत में जनजातियों का रहा है, वैसा उदाहरण विश्व में कहीं और नहीं मिलता। भारत में प्रत्येक विदेशी आक्रमण के विरुद्ध जनजातियों ने सबसे पहले संघर्ष किया और शस्त्र उठाए हैं। यह संघर्ष दोनों प्रकार का हुआ--राज्य सत्ताओं की कमान में सैन्य शक्ति के रूप में स्वतंत्र संघर्ष और बलिदान के रूप में। यदि विदेशी आक्रांताओं के छल-बल से देशी सत्ताएँ पराभूत हुईं तो जनजातियों ने इन राजपरिवारों के सदस्यों को वन में छिपाकर अपने प्राणों की आहुतियाँ दीं । स्वाधीनता आंदोलन के दूसरे चरण में जब स्वाधीनता संघर्ष के लिए अहिंसक अभियान आरंभ हुआ, असहयोग आंदोलन चला, तब भी जनजातियों ने अपने-अपने क्षेत्र में अंग्रेजों के प्रति असहयोग आरंभ किया। नमक सत्याग्रह और जंगल सत्याग्रह में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका जनजातीय समाज की ही रही है। यह हमारी ऐतिहासिक भूल रही है कि वनवासियों-जनजातियों की पीढ़ियों के बलिदान के बावजूद इतिहास के पन्नों में उनका उल्लेख पर्याप्त नहीं है। अनगिनत वनवासी योद्धा आज भी अनजाने-अपरिचित हैं, उनका कहीं कोई उल्लेख नहीं है। देश भर के वनवासी वीरों के महाबलिदान की गाथाओं को तलाशते हुए एक विचार बना कि स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में 75 वनवासी वीरों के शौर्य, पराक्रम और बलिदान पर केंद्रित एक संग्रह तैयार किया जाए। इसी दिशा में यह एक लघु प्रयास है। यद्यपि जनजातियों के बलिदान की गाथा अनंत है, पर इस संग्रह में प्रतीक के रूप में मात्र 75 ही लिये गए हैं।
Language: Hindi
Page No: 216
Legal Disclaimer: Product images are for illustrative purposes only. Images/packaging/ labels may vary from time to time due to changes made by the manufacturer's manufacturing batch and location.
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Description
Janjateeya Yoddha : (Swabhiman Aur Swadheenta Ka Sangharsh) Tribal Warriors Of India-Ranjana Chitale
About the Products:
संस्कृति स्वाभिमान, परंपरा और स्वायत्तता की रक्षा के लिए जितना बलिदान, जितना संघर्ष भारत में जनजातियों का रहा है, वैसा उदाहरण विश्व में कहीं और नहीं मिलता। भारत में प्रत्येक विदेशी आक्रमण के विरुद्ध जनजातियों ने सबसे पहले संघर्ष किया और शस्त्र उठाए हैं। यह संघर्ष दोनों प्रकार का हुआ--राज्य सत्ताओं की कमान में सैन्य शक्ति के रूप में स्वतंत्र संघर्ष और बलिदान के रूप में। यदि विदेशी आक्रांताओं के छल-बल से देशी सत्ताएँ पराभूत हुईं तो जनजातियों ने इन राजपरिवारों के सदस्यों को वन में छिपाकर अपने प्राणों की आहुतियाँ दीं । स्वाधीनता आंदोलन के दूसरे चरण में जब स्वाधीनता संघर्ष के लिए अहिंसक अभियान आरंभ हुआ, असहयोग आंदोलन चला, तब भी जनजातियों ने अपने-अपने क्षेत्र में अंग्रेजों के प्रति असहयोग आरंभ किया। नमक सत्याग्रह और जंगल सत्याग्रह में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका जनजातीय समाज की ही रही है। यह हमारी ऐतिहासिक भूल रही है कि वनवासियों-जनजातियों की पीढ़ियों के बलिदान के बावजूद इतिहास के पन्नों में उनका उल्लेख पर्याप्त नहीं है। अनगिनत वनवासी योद्धा आज भी अनजाने-अपरिचित हैं, उनका कहीं कोई उल्लेख नहीं है। देश भर के वनवासी वीरों के महाबलिदान की गाथाओं को तलाशते हुए एक विचार बना कि स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में 75 वनवासी वीरों के शौर्य, पराक्रम और बलिदान पर केंद्रित एक संग्रह तैयार किया जाए। इसी दिशा में यह एक लघु प्रयास है। यद्यपि जनजातियों के बलिदान की गाथा अनंत है, पर इस संग्रह में प्रतीक के रूप में मात्र 75 ही लिये गए हैं।
Language: Hindi
Page No: 216
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