

Jeevan Samvad-2 - J. Krishnamurti
Jeevan Samvad-2 - J. Krishnamurti
About The Product:
स्वतंत्रचेता दार्शनिक तथा शिक्षक जे. कृष्णमूर्ति के साथ आगंतुक जिज्ञासुओं के वार्तालाप का संग्रह है। इन वार्तालापों के साथ ही इसमें प्रकृति के सुरम्य वर्णन भी अनुस्यूत हैं, जिनसे देखने व सुनने की कला सीखने को मिलती है। कृष्ण जी ने कतिपय स्थलों पर अपने अंतर्जगत की अनुभूतियों के संकेत भी दिये हैं। इस पुस्तक में ‘भक्ति और उपासना’,‘मृत्यु का भय’, ‘कर्म’, ‘मैं’,‘अनुभव का मूल्यांकन’,‘सुनना’,‘अभिनेता’ और ‘ईर्ष्या तथा अकेलापन’ जैसे विषयों पर संवाद संग्रहीत हैं। उस पथरीली पगडंडी पर हम नीचे उतरते रहे। ऐसा कोई अवलोकन करने वाला नहीं था जो उनके पीछे सुनता हुआ, दया महसूस करता हुआ चल रहा था। वह प्रेम और दया के कारण उनका हिस्सा नहीं बना था; वह वे स्त्रियाँ ही थीं; वह मिट चुका था, केवल वे ही थीं। वे दोनों कोई अजनबी नहीं थीं जो पहाड़ पर उसे मिली थीं, वे उसी का हिस्सा थीं; उन लकड़ी के गट्ठरों को पकड़े रखने वाले हाथ उसी के थे; वह पसीना, वह थकान, वह शरीर से आने वाली गंध, वह भूख उनकी नहीं थी, जिसे कोई साझा करे और उस पर दुःखी हो। समय और आकाश विलीन हो चुके थे।
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Jeevan Samvad-2 - J. Krishnamurti
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स्वतंत्रचेता दार्शनिक तथा शिक्षक जे. कृष्णमूर्ति के साथ आगंतुक जिज्ञासुओं के वार्तालाप का संग्रह है। इन वार्तालापों के साथ ही इसमें प्रकृति के सुरम्य वर्णन भी अनुस्यूत हैं, जिनसे देखने व सुनने की कला सीखने को मिलती है। कृष्ण जी ने कतिपय स्थलों पर अपने अंतर्जगत की अनुभूतियों के संकेत भी दिये हैं। इस पुस्तक में ‘भक्ति और उपासना’,‘मृत्यु का भय’, ‘कर्म’, ‘मैं’,‘अनुभव का मूल्यांकन’,‘सुनना’,‘अभिनेता’ और ‘ईर्ष्या तथा अकेलापन’ जैसे विषयों पर संवाद संग्रहीत हैं। उस पथरीली पगडंडी पर हम नीचे उतरते रहे। ऐसा कोई अवलोकन करने वाला नहीं था जो उनके पीछे सुनता हुआ, दया महसूस करता हुआ चल रहा था। वह प्रेम और दया के कारण उनका हिस्सा नहीं बना था; वह वे स्त्रियाँ ही थीं; वह मिट चुका था, केवल वे ही थीं। वे दोनों कोई अजनबी नहीं थीं जो पहाड़ पर उसे मिली थीं, वे उसी का हिस्सा थीं; उन लकड़ी के गट्ठरों को पकड़े रखने वाले हाथ उसी के थे; वह पसीना, वह थकान, वह शरीर से आने वाली गंध, वह भूख उनकी नहीं थी, जिसे कोई साझा करे और उस पर दुःखी हो। समय और आकाश विलीन हो चुके थे।
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