

Khaibar Darra - Pankaj Subeer
Khaibar Darra - Pankaj Subeer
About The Product:
‘‘शहर के बीचों-बीच से होकर बह रहे नाले के दोनों तरफ़ फ़िलहाल यह दंगा चल रहा है। यह नाला शहर को दो भागों में बाँटता हुआ बहता है लेकिन बहता केवल बरसात में है और फिर सूख जाता है। इस नाले पर तीन-चार पुल बने हैं, जो शहर के दोनों तरफ़ के हिस्सों को आपस में जोड़ते हैं। मगर जोड़ने पर भी दोनों तरफ़ के हिस्से जुड़ नहीं पाते। असल में नाले ने शहर को भौगोलिक रूप से ही दो भागों में नहीं बाँटा है, बल्कि साम्प्रदायिक रूप से भी दो फाड़ कर दिया है। जैसे ही नाला सूखता है, नाले में से होकर आने-जाने की पगडंडियाँ बन जाती हैं और सबसे ज़्यादा आवाजाही इन्हीं से होती है। ये पगडंडी वाले शॉर्ट-कट ही दोनों तरफ़ के हिस्सों को जोड़ते हैं। लोगों ने इस रास्ते को नाम दिया हुआ है - ख़ैबर दर्रा, लेकिन यह किसी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नाम नहीं है।’’ - इस पुस्तक से ऐसा ही ‘ख़ैबर दर्रा’ देश के हर एक शहर में चाहिए जो लोगों को आपस में जोड़े। आज जब समाज के हर वर्ग के बीच नफ़रत की खाई चौड़ी-गहरी हो रही है तो ज़रूरत है अनेक ‘ख़ैबर दर्राओं’ की। पंकज सुबीर एक संवेदनशील लेखक हैं जो छोटी-से-छोटी बात को गहराई से समझकर ऐसे प्रस्तुत करते हैं जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती है। सभी साहित्यिक विधाओं में निपुण, लेखक का हमेशा देर कर देता हूँ मैं के बाद यह एक और कहानी-संग्रह प्रस्तुत है।
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Legal Disclaimer: Product color may slightly vary due to photographic lighting sources or your monitor settings.
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Khaibar Darra - Pankaj Subeer
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‘‘शहर के बीचों-बीच से होकर बह रहे नाले के दोनों तरफ़ फ़िलहाल यह दंगा चल रहा है। यह नाला शहर को दो भागों में बाँटता हुआ बहता है लेकिन बहता केवल बरसात में है और फिर सूख जाता है। इस नाले पर तीन-चार पुल बने हैं, जो शहर के दोनों तरफ़ के हिस्सों को आपस में जोड़ते हैं। मगर जोड़ने पर भी दोनों तरफ़ के हिस्से जुड़ नहीं पाते। असल में नाले ने शहर को भौगोलिक रूप से ही दो भागों में नहीं बाँटा है, बल्कि साम्प्रदायिक रूप से भी दो फाड़ कर दिया है। जैसे ही नाला सूखता है, नाले में से होकर आने-जाने की पगडंडियाँ बन जाती हैं और सबसे ज़्यादा आवाजाही इन्हीं से होती है। ये पगडंडी वाले शॉर्ट-कट ही दोनों तरफ़ के हिस्सों को जोड़ते हैं। लोगों ने इस रास्ते को नाम दिया हुआ है - ख़ैबर दर्रा, लेकिन यह किसी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नाम नहीं है।’’ - इस पुस्तक से ऐसा ही ‘ख़ैबर दर्रा’ देश के हर एक शहर में चाहिए जो लोगों को आपस में जोड़े। आज जब समाज के हर वर्ग के बीच नफ़रत की खाई चौड़ी-गहरी हो रही है तो ज़रूरत है अनेक ‘ख़ैबर दर्राओं’ की। पंकज सुबीर एक संवेदनशील लेखक हैं जो छोटी-से-छोटी बात को गहराई से समझकर ऐसे प्रस्तुत करते हैं जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती है। सभी साहित्यिक विधाओं में निपुण, लेखक का हमेशा देर कर देता हूँ मैं के बाद यह एक और कहानी-संग्रह प्रस्तुत है।
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