

Pratinidhi Dalit Kahaniyan - Dr. Bajrang Bihari Tiwari (Edited By)
Pratinidhi Dalit Kahaniyan - Dr. Bajrang Bihari Tiwari (Edited by)
About The Product:
‘‘दलित कहानी का आधार है दलित जीवनानुभव। इसमें अनुभव प्राथमिक है, कला और शिल्प का स्थान उसके बाद आता है। वह अनुभव जो जाति-विशेष में होने से मिलता है और जिससे रचनाकार स्वयं गुज़रा है या ‘अपनों’ को गुज़रते देखा है। जहाँ जीवन-स्थिति का स्वीकार नहीं, उसका प्रतिरोध है। इस प्रतिरोध की अपनी वैचारिकी है। यह वैचारिकी रोज़-ब-रोज़ अद्यतन होती रहती है। इसकी नींव में फुले-आंबेडकर का गतिशील चिंतन है। इस वैचारिकी को समृद्ध करने के लिए समता और न्याय की माँग करने वाले अन्य चिंतकों से संवाद व लेन-देन होता रहता है। मुख्यतः अनुभव के आधार पर रची जाने वाली दलित कहानी अस्मिता की परवाह करती है और विषमता पोषक ढाँचे से छुटकारा पाने की या तो राह सुझाती है या अपने पाठकों को राह खोजने के लिए प्रेरित करती है।’’ - पुस्तक की भूमिका से प्रतिनिधि दलित कहानियाँ की कहानियाँ इस अर्थ में प्रतिनिधि रचनाएँ हैं कि वे हिन्दी के दलित कहानीकारों की सभी पीढ़ियों का और लगभग सभी महत्त्वपूर्ण प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन प्रतिनिधि कहानियों का चयन दलित साहित्य के क्षेत्र में लगभग तीन दशकों से कार्यरत विद्वान प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने किया है। अनेक सम्मानों से विभूषित प्रो. तिवारी की दलित साहित्य पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और आपने सम्पूर्ण भारत के दलित साहित्य का विशद अध्ययन किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु महाविद्यालय में प्रोफ़ेसर तिवारी कथादेश मासिक में दलित साहित्य पर नियमित कॉलम भी लिखते हैं।
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Pratinidhi Dalit Kahaniyan - Dr. Bajrang Bihari Tiwari (Edited by)
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‘‘दलित कहानी का आधार है दलित जीवनानुभव। इसमें अनुभव प्राथमिक है, कला और शिल्प का स्थान उसके बाद आता है। वह अनुभव जो जाति-विशेष में होने से मिलता है और जिससे रचनाकार स्वयं गुज़रा है या ‘अपनों’ को गुज़रते देखा है। जहाँ जीवन-स्थिति का स्वीकार नहीं, उसका प्रतिरोध है। इस प्रतिरोध की अपनी वैचारिकी है। यह वैचारिकी रोज़-ब-रोज़ अद्यतन होती रहती है। इसकी नींव में फुले-आंबेडकर का गतिशील चिंतन है। इस वैचारिकी को समृद्ध करने के लिए समता और न्याय की माँग करने वाले अन्य चिंतकों से संवाद व लेन-देन होता रहता है। मुख्यतः अनुभव के आधार पर रची जाने वाली दलित कहानी अस्मिता की परवाह करती है और विषमता पोषक ढाँचे से छुटकारा पाने की या तो राह सुझाती है या अपने पाठकों को राह खोजने के लिए प्रेरित करती है।’’ - पुस्तक की भूमिका से प्रतिनिधि दलित कहानियाँ की कहानियाँ इस अर्थ में प्रतिनिधि रचनाएँ हैं कि वे हिन्दी के दलित कहानीकारों की सभी पीढ़ियों का और लगभग सभी महत्त्वपूर्ण प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन प्रतिनिधि कहानियों का चयन दलित साहित्य के क्षेत्र में लगभग तीन दशकों से कार्यरत विद्वान प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने किया है। अनेक सम्मानों से विभूषित प्रो. तिवारी की दलित साहित्य पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और आपने सम्पूर्ण भारत के दलित साहित्य का विशद अध्ययन किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु महाविद्यालय में प्रोफ़ेसर तिवारी कथादेश मासिक में दलित साहित्य पर नियमित कॉलम भी लिखते हैं।
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