

Silwaton Bhari Rooh - Irshad Khan 'Sikandar' (Editing By Ashok Kumar Pandey)
Silwaton Bhari Rooh - Irshad Khan 'Sikandar' (Editing By Ashok Kumar Pandey)
About The Product:
‘‘इरशाद ख़ान ‘सिकन्दर’ को एक कहानीकार के रूप में जानना किसी नए इरशाद को जानना नहीं है बल्कि उस शायर की दृष्टि के विस्तार और समझ की गहराई को नए सिरे से समझना है। इरशाद के पास ज़िन्दा अनुभवों का जो ख़जाना था, स्मृतियों की जो पेंचदार विरासत थी और भाषा के जो बहुरंगी औज़ार थे, उन सबने इन कहानियों को बड़ी खूबसूरती से बुना है। पढ़ते हुए आश्चर्य होता है कि इतनी ज़रा-सी उम्र में इरशाद लगातार कितना लिख-पढ़-सोच और महसूस कर रहे थे।’’ - अशोक कुमार पाण्डेय ‘‘इरशाद की इन कहानियों की भाषा में हिन्दी और उर्दू का संगम ही दिखाई नहीं देता है बल्कि उसमें अवधी, भोजपुरी, मैथिली से लेकर दिल्ली की करखानदारी, सभी जुबानों की रंगत मिलती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन कहानियों में ग़ज़ब की क़िस्सागोई है। पूरब के गाँव-देहातों में जिस तरह से चौक-चैराहों पर लोगों की मंडली बैठती-बतियाती है, सुनती-सुनाती है, इरशाद की कहानियों को पढ़ते हुए अनायास उन सबकी याद आ जाती है।’’ - प्रभात रंजन उर्दू-हिन्दी साहित्य में इरशाद ख़ान ‘सिकन्दर’ एक उभरते प्रतिभाशाली शायर थे। उनके अब तक तीन ग़ज़ल-संग्रह - दूसरा इश्क़, आँसुओं का तर्जुमा, चाँद के सिरहाने लालटेन और तीन नाटक - अमीरन उमराव अदा, जौन एलिया का जिन, ठेके पर मुशाइरा प्रकाशित हो चुके हैं, जो बेहद लोकप्रिय हुए। आँसुओं का तर्जुमा को 2020 में ‘अंतर्राष्ट्रीय शिवना कविता सम्मान’ और 2024 में जौन एलिया का जिन को ‘स्वयं प्रकाश स्मृति सम्मान’ से सम्मानित किया गया। मात्र 42 वर्ष की उम्र में 18 मई 2025 को अचानक उनके निधन से उर्दू-हिन्दी साहित्य जगत ने बहुत कुछ खो दिया।
Product Details:
Legal Disclaimer: Product color may slightly vary due to photographic lighting sources or your monitor settings.
Product Information
Product Information
Shipping & Returns
Shipping & Returns
Description
Silwaton Bhari Rooh - Irshad Khan 'Sikandar' (Editing By Ashok Kumar Pandey)
About The Product:
‘‘इरशाद ख़ान ‘सिकन्दर’ को एक कहानीकार के रूप में जानना किसी नए इरशाद को जानना नहीं है बल्कि उस शायर की दृष्टि के विस्तार और समझ की गहराई को नए सिरे से समझना है। इरशाद के पास ज़िन्दा अनुभवों का जो ख़जाना था, स्मृतियों की जो पेंचदार विरासत थी और भाषा के जो बहुरंगी औज़ार थे, उन सबने इन कहानियों को बड़ी खूबसूरती से बुना है। पढ़ते हुए आश्चर्य होता है कि इतनी ज़रा-सी उम्र में इरशाद लगातार कितना लिख-पढ़-सोच और महसूस कर रहे थे।’’ - अशोक कुमार पाण्डेय ‘‘इरशाद की इन कहानियों की भाषा में हिन्दी और उर्दू का संगम ही दिखाई नहीं देता है बल्कि उसमें अवधी, भोजपुरी, मैथिली से लेकर दिल्ली की करखानदारी, सभी जुबानों की रंगत मिलती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन कहानियों में ग़ज़ब की क़िस्सागोई है। पूरब के गाँव-देहातों में जिस तरह से चौक-चैराहों पर लोगों की मंडली बैठती-बतियाती है, सुनती-सुनाती है, इरशाद की कहानियों को पढ़ते हुए अनायास उन सबकी याद आ जाती है।’’ - प्रभात रंजन उर्दू-हिन्दी साहित्य में इरशाद ख़ान ‘सिकन्दर’ एक उभरते प्रतिभाशाली शायर थे। उनके अब तक तीन ग़ज़ल-संग्रह - दूसरा इश्क़, आँसुओं का तर्जुमा, चाँद के सिरहाने लालटेन और तीन नाटक - अमीरन उमराव अदा, जौन एलिया का जिन, ठेके पर मुशाइरा प्रकाशित हो चुके हैं, जो बेहद लोकप्रिय हुए। आँसुओं का तर्जुमा को 2020 में ‘अंतर्राष्ट्रीय शिवना कविता सम्मान’ और 2024 में जौन एलिया का जिन को ‘स्वयं प्रकाश स्मृति सम्मान’ से सम्मानित किया गया। मात्र 42 वर्ष की उम्र में 18 मई 2025 को अचानक उनके निधन से उर्दू-हिन्दी साहित्य जगत ने बहुत कुछ खो दिया।
Product Details:
Legal Disclaimer: Product color may slightly vary due to photographic lighting sources or your monitor settings.












