
Ummeed: Manushya Zinda Hai-Dr. Sachchidanand Joshi
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About the Products:
संस्कृतिकर्मी, कवि, लेखक एवं नाटककार डॉ. सच्चिदानंद जोशी द्वारा लिखा गया उनका नया नाटक। उनके तेवर और शैली में लिखे गए, इस नाटक में विभाजन के कई वर्षों के बाद भी देश में होने वाले सांप्रदायिक दंगों के चलते होने वाले नुकसान और कभी खत्म न होने वाले दर्द को बयाँ किया गया है। नाटक में एक-दूसरे से गुँथे हुए, दो दौर एक साथ चलते हैं। एक दौर आज का और एक देश के विभाजन की विभीषिका का, जो इतिहास की सबसे दुःखद घटनाओं में से एक है और जिसमें भयावह मानव विस्थापन और जबरन पलायन की व्यथा शामिल है। लेखक के अनुसार इन किस्सों को याद रखना जरूरी है, क्योंकि बँटवारे का इतिहास, सिर्फ हिंसक वारदातों की तारीख नहीं है। इसमें हमदर्दी है, इनसानियत के तमाम किस्से हैं और सबसे बड़ी बात उम्मीद है। बहुत से लोगों ने पागलपन के उस दौर में भी इनसानियत और दोस्ती को जिंदा बचाए रखा था। जो उस दर्द में भी नई उम्मीद का एक अंकुर बो गया था। मौजूदा दौर में भारत की एकता को बनाए रखने के लिए एक जरूरी पेशकश 'उम्मीद : मनुष्य जिंदा है'।
Language: Hindi
Page No: 112
Legal Disclaimer: Product images are for illustrative purposes only. Images/packaging/ labels may vary from time to time due to changes made by the manufacturer's manufacturing batch and location.
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संस्कृतिकर्मी, कवि, लेखक एवं नाटककार डॉ. सच्चिदानंद जोशी द्वारा लिखा गया उनका नया नाटक। उनके तेवर और शैली में लिखे गए, इस नाटक में विभाजन के कई वर्षों के बाद भी देश में होने वाले सांप्रदायिक दंगों के चलते होने वाले नुकसान और कभी खत्म न होने वाले दर्द को बयाँ किया गया है। नाटक में एक-दूसरे से गुँथे हुए, दो दौर एक साथ चलते हैं। एक दौर आज का और एक देश के विभाजन की विभीषिका का, जो इतिहास की सबसे दुःखद घटनाओं में से एक है और जिसमें भयावह मानव विस्थापन और जबरन पलायन की व्यथा शामिल है। लेखक के अनुसार इन किस्सों को याद रखना जरूरी है, क्योंकि बँटवारे का इतिहास, सिर्फ हिंसक वारदातों की तारीख नहीं है। इसमें हमदर्दी है, इनसानियत के तमाम किस्से हैं और सबसे बड़ी बात उम्मीद है। बहुत से लोगों ने पागलपन के उस दौर में भी इनसानियत और दोस्ती को जिंदा बचाए रखा था। जो उस दर्द में भी नई उम्मीद का एक अंकुर बो गया था। मौजूदा दौर में भारत की एकता को बनाए रखने के लिए एक जरूरी पेशकश 'उम्मीद : मनुष्य जिंदा है'।
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